Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2008

एक चुटकी सिन्दूर

The topic was suggested by my frnd Ruchi...so readers, if u find the poem pathetic... just say "Go n die".... :)


जब मैं हिन्दी फिल्मों के बारे में सोचने बैठती हूँ तो कई फिल्में और उनके संवाद मेरे ध्यान में आते हैं जो टिप्पनीय होते हैं । ऐसा ही एक संवाद है फ़िल्म " ओम् शान्ति ओम्" का जो मुझे अनायास ही बहुत आकर्षित करता है। वो कुछ इस प्रकार है :
एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुम क्या जानो ……
सुहागन के सिर का ताज होता है ये एक चुटकी सिन्दूर……
ये शब्द जब सिनेमा हॉल के चित्रपट से छूटते हैं ,
अंधेरे को चीर तीर की तरह निकलते हैं,
चमकता है हिरोइन का चेहरा सुंदर और दमकता है चुटकी भर सिन्दूर
और दर्शकों के मुँह से निकलती है वाह वाही भरपूर ।
अब जब मेरे सभी मित्र ये संवाद दोहराते हैं और हँसते हैं , ये शब्द मेरे कानों में भी देर तक गूंजते हैं…
मेरे ध्यान में भी आता है ये “एक चुटकी सिन्दूर”................

कहने को तो एक चुटकी की कहानी है,
लेकिन देखो तो इसकी महिमा बड़ी निराली है,
थोड़ा सा पाउडर ही तो है लाल रंग का :
पूजा करो तो टीका बन जंचती है,
खेलो तो अबीर बन उड़ती है,
ललाट पे सजा लो तो…